केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को अब मध्य प्रदेश में भी जांच के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेना होगी। राज्य सरकार ने दिल्ली विषय पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा-3 की शक्तियों के तहत प्रदेश में जांच को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया है।
मध्य प्रदेश ने CBI जाँच के लिये पूर्व सहमति क्यों अनिवार्य की
- यह निर्णय भारतीय न्याय संहिता (BNS) में बदलावों और CBI के साथ हाल ही में हुए परामर्शों पर विचार करता है।
- इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A के तहत, एजेंसियों को सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जाँच करने के लिये अनुमति की आवश्यकता होती है।
- इसमें प्रावधान है कि PC अधिनियम के तहत किसी लोक सेवक द्वारा किये गए किसी भी अपराध में पुलिस अधिकारी द्वारा उचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई जाँच नहीं की जाएगी।
- किसी भी अन्य अपराध के लिय सभी पिछली सामान्य सहमति और किसी भी अन्य अपराध के लिये राज्य सरकार द्वारा केस-दर-केस आधार पर दी गई कोई भी सहमति लागू रहेगी।
- मेघालय, मिज़ोरम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, केरल और पंजाब समेत कई राज्यों ने CBI जाँच के लिये सामान्य सहमति वापस ले ली है।
मध्य प्रदेश के निर्णय के निहितार्थ
- लिखित सहमति की आवश्यकता राज्य के अधिकारियों के खिलाफ CBI जाँच शुरू करने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है।
- इससे राज्य सरकार और CBI दोनों पर प्रशासनिक बोझ बढ़ सकता है, जिससे भ्रष्टाचार की जाँच की दक्षता प्रभावित हो सकती है।
- यह निर्णय राज्यों द्वारा केंद्रीय जाँच एजेंसियों पर अधिक नियंत्रण रखने की व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो भारत में संघीय शासन की गतिशीलता को प्रभावित करता है।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के संदर्भ में मुख्य तथ्य
- संथानम समिति की भ्रष्टाचार निवारण समिति (1962-1964) की सिफारिशों के बाद, CBI की आधिकारिक स्थापना वर्ष 1963 में गृह मंत्रालय के एक प्रस्ताव द्वारा की गई थी।
- यह दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से अपनी जाँच शक्तियाँ प्राप्त करता है।
- यह कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, जो प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत आता है।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जाँच के संदर्भ में CBI की निगरानी केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा की जाती है।
- यह इंटरपोल सदस्य देशों के साथ जाँच के समन्वय के लिये नोडल पुलिस एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
- CBI का निदेशक दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (Delhi Special Police Establishment- DSPE) का पुलिस महानिरीक्षक (IGP) भी होता है जो संगठन के प्रशासन के लिये ज़िम्मेदार होता है।
- CBI निदेशक की नियुक्ति: प्रारंभ में DSPE अधिनियम, 1946 के तहत नियुक्ति की जाती थी। विनीत नारायण मामले में सर्वोच्च न्यायालय की सिफारिशों के बाद, वर्ष 2003 में इस प्रक्रिया को संशोधित किया गया।
- वर्तमान व्यवस्था में, लोकपाल अधिनियम 2014 के तहत प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश) की एक समिति नियुक्ति की सिफारिश करती है।
- निदेशक का कार्यकाल दो वर्ष का होता है जिसे जनहित में पाँच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
- वर्ष 2021 में, राष्ट्रपति ने CBI और प्रवर्तन निदेशालय के निदेशकों के कार्यकाल को दो वर्ष से बढ़ाकर पाँच वर्ष करने के लिये दो अध्यादेश जारी किये।
- DSPE अधिनियम, 1946 में किये गए संशोधनों के अनुसार, CBI प्रमुख का कार्यकाल अब तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा।
CBI के अधिकार क्षेत्र को नियंत्रित करने वाला विधिक ढाँचा
- CBI दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम, 1946 के तहत कार्य करती है।
- DSPE अधिनियम की धारा 6 के अनुसार, CBI अधिकारियों को केंद्रशासित प्रदेशों या रेलवे क्षेत्रों को छोड़कर किसी भी राज्य क्षेत्र में शक्तियों का प्रयोग करने के लिये राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता होगी।
- CBI का विधिक आधार संघ सूची की प्रविष्टि 80 पर आधारित है, जो अन्य राज्यों को उनकी अनुमति से पुलिस शक्तियों का विस्तार करने की अनुमति देता है।
- केंद्रशासित प्रदेशों के लिये एक बल होने के नाते CBI केवल राज्यों की सहमति से ही जाँच कर सकती है, जैसा कि वर्ष 1970 में एडवांस इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामले में निर्धारित किया गया था।
- सहमति या तो मामला-विशिष्ट या सामान्य हो सकती है। सामान्य सहमति आमतौर पर राज्यों के अंदर केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की जाँच को सुविधाजनक बनाने के लिये प्रदान की जाती है, क्योंकि संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत ‘पुलिस’ राज्य सूची की प्रविष्टि 2 में है।